आजाद-लोहिया और समाजवाद

Update: 2025-02-27 07:54 GMT


दीपक मिश्र

शहीद शिरोमणि चंद्रशेखर आजाद की शहादत और वीरता से जुड़े बहुआयामी पहलुओं से पूरी दुनिया अवगत है। इस पक्ष पर विद्वानों एवं इतिहासकारों ने काफी कुछ लिखा और शोध किया है, किंतु समाजवादी आंदोलन एवं विचारधारा के संदर्भ में उनकी भूमिका और योगदान पर व्यापक चर्चा की अभी भी जरूरत है। उनके जीवन व सैद्धांतिक आग्रहों का निष्कर्ष उन्हें एक प्रतिबद्ध व प्रगतिशील समाजवादी सिद्ध करता है।

इतिहास साक्षी है कि प्रथम अखिल भारतीय समाजवादी संगठन की स्थापना 8 सितम्बर 1928 को नई दिल्ली स्थित फिरोजशाह कोटला के पुराने किले के परिसर में हुई थी जिसके अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ही थे। इसका नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन था। कहीं-कहीं एसोसिएशन की जगह आर्मी शब्द का भी उल्लेख मिलता है। चंद्रशेखर आजाद इसके मुखिया जीवन पर्यन्त 27 फरवरी 1931 तक बने रहे। भगत सिंह, सुखदेव, शिवराम हरि राजगुरु, भगवती चरण वोहरा बटुकेश्वर दत्त सरीखे क्रांतिकारियों वाले इस संगठन को ‘समाजवाद‘ को नवीन आयाम देने का श्रेय जाता है। आजाद के नेतृत्व और भगत सिंह के प्रस्ताव पर ही रिपब्लिकन एसोसिएशन को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के रूप में पुर्नगठित किया गया। पहली बार अखिल भारतीय स्तर पर दृढ़तापूर्वक किसी संगठन ने समाजवाद को अपना अंतिम लक्ष्य घोषित किया। इसके घोषणा पत्र में स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि भारतीय पूंजीपति भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूंजीपति से सरकार में कुछ हिस्सा प्राप्त करना चाहता है। इसी कारण मेहनतकश की तमाम आशाएं अब सिर्फ समाजवाद पर टिकी है। इस घोषणा पत्र को 1929 में ब्रिटानिया हुकूमत ने जब्त किया था। आम तौर पर किसी भी संगठन का घोषणा पत्र उसके मुखिया की सोच को ही प्रतिबिम्बित करता है। इससे पता चलता है कि आजाद और उनके साथियों की समाजवादी अवधारणाओं में गहरी निष्ठा थी।

आजाद के अनुसार समाजवाद के तीन पक्ष है-पहला सभी प्रकार के शोषण का अंत, दूसरा मानव मात्र की समानता और तीसरा श्रेणीरहित समाज का निर्माण। ब्रिटिश साम्राज्यशाही के उन्मूलन के पश्चात आजाद और उनके साथी भारत को समाजवादी गणतंत्र के रूप में दुनिया का आदर्श देश बनाना चाहते थे। समाजवाद के आदर्शों को डाॅ0 राम मनोहर लोहिया ने विशेषकर आजादी के उपरान्त व्यापक वैचारिक आधार दिया। लोहिया ने जीवटता के साथ समाजवाद को भारतीय राजनीति के लक्ष्य के रूप में स्वीकारा। 1995 में समाजवादी युवक सभा (समाजवादी युवजन सभा) के पुरी सम्मेलन में लोहिया ने

कहा था कि समानता, अहिंसा, विकेंद्रीकरण,लोकतंत्र और समाजवाद से पांचों आज भारत की समग्र राजनीति के अंतिम लक्ष्य दिखाई पड़ते हैं। यदि बिना लाग-लपेट के कहा जाए कि चंद्रशेखर आजाद के समाजवाद की निर्गुण धारणा को डाॅ0 राम मनोहर लोहिया ने सगुण व्याख्या करते हुए सैद्धांतिक और बौद्विक आधार दिया तो गलत न होगा।

क्रांतिधर्मी और परिवर्तनकामी सोच के साथ-साथ दोनों नेता अनावश्यक हिंसा के प्रबल विरोधी थी। चंद्रशेखर आजाद का अपने साथियों को स्पष्ट निर्देश था कि किसी निर्दोष का बेमतलब खून न बहाया जाय। भूमिगत आंदोलन में भी लोहिया ने अनावश्यक हिंसा का विरोध किया। वह गुप्त रेडियो और अन्य विधाओं से क्रांति तथा आजादी की लड़ाई को प्रखर बनाते रहे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिगत रहते हुए डाॅ0 लोहिया ने आजाद से प्रभावित होकर ही आजाद के नाम पर ‘आजाद दस्ता’ का संचालन किया। इस दौरान लोहिया की तीन पुस्तकें ‘जंगजू आगे बढ़ो‘, ‘क्रांति की तैयारी’ और ‘आजाद राज कैसे बने’ प्रकाशित हुई। 1928 से 1931 तक ब्रिटिश हुकूमत और पुलिस के लिए आजाद और उनके साथी सबसे बड़े सरदर्द थे, उसी तरफ 1942 से 44 तक लोहिया और उनके समाजवादी साथी अंग्रेजी पुलिस के निशाने पर रहें। दोनों ने साम्प्रदायिक प्रतकार को नया आयाम दिया। मैक्स हरकोर्ट के शोधों एवं तत्कालीन वाइसराय के प्रतिवेदनों से पता चलता है कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की स्मृतियों को ताजा कर दिया। ‘भारत छोड़ो आंदोलन‘ की सफलता डाॅ0 लोहिया, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी व आजाद दस्ते को दिया जाना ही उचित होगा।

आजाद और लोहिया ने सार्वजनिक धन का उपयोग कभी भी स्वयं पर और अपने परिवार पर नहीं किया। भगत सिंह ने एक बार चंद्रशेखर आजाद से उनकी माता का पता पूछा, ताकि उन्हें कुछ पैसे देकर उनकी सेवा व इलाज का प्रबंध किया जा सकें। आजाद, भगत सिंह पर भड़क उठे और यह कहते हुए चर्चा का रुख बदल दिया कि जब देश आजाद होगा, तो भारत माता की तरह मेरी मां की भी सेवा हो जाएगी। अभी हमें सिर्फ भारत मां और उन माताओं के विषय में सोचना है जिनका कोई नहीं। ऐसे ही विचारों के पोषक लोहिया भी थे। जब बीमार हुए तो उन्हें अमेरिकी डाॅक्टर से इलाज कराने की सलाह दी गई लेकिन डाॅ0 लोहिया ने साफ मना कर दिया और कहा कि उनकी चिकित्सा के लिए अनावश्यक धन व्यय करने की आवश्यकता नहीं है। जब उनके जैसे लोग सरकारी अस्पतालों में मरेंगे तभी इन अस्पतालों की दशा सुधरेगी।

भगत सिंह के प्रति दोनों के मन में अगाध स्नेह और श्रद्धा थी। आजाद छापा मारकर भगत सिंह को कारागार से छुड़ाना चाहते थे। जेल तोड़ने की कार्ययोजना बन चुकी थी। लेकिन इससे पहले कि वे भगत सिंह को जेल से छुड़ाते स्वयं ही शहीद हो गए। जब भगत सिंह को फांसी दी गई, डाॅ0 लोहिया जर्मनी में उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उन्होंने लीग आॅफ नेशंस की बैठक में जोखिम उठाकर भगत सिंह को फांसी का विरोध किया। उन्हें दर्शक दीर्घा से बाहर निकाल दिया गया तो दूसरे दिन ‘लू-चावै-ह्यूमेनाइट‘ नामक अखबार में अपना पत्र प्रकाशित कर वितरित किया। यूरोप में ब्रिटेन के खिलाफ भगत सिंह के लिए किया गया व्यापक विरोध प्रदर्शन लोहिया के मन में उनके प्रति सम्मान का परिचायक है।

आजाद को बचपन में गरीबी और युवावस्था में क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन के कारण राजनीतिक सिद्धांतों के अध्ययन, मनन का पर्याप्त अवसर भले नहीं मिला, किन्तु आजाद एक मेधावी छात्र थे। बचपन से ही उनका सपना था कि काशी में पढ़कर विद्वान बनेंगे। उनकी ज्ञान-पिपाशा को देखकर ही पत्रकार व ‘आज’ के संस्थापक बाबू शिवप्रसाद गुप्त जी ने उन्हें विद्यापीठ में पढ़ने के लिए आर्थिक सहयोग देने की प्रतिबद्धता जाहिर की थी। आईजी काॅलिन्स के अनुसार उन्हें माक्र्स व एंजिल्स की गहरी समझ थी। उनके झोले में तमंचा के साथ-साथ किताबें व अखबार अवश्य होते थे।

शचींद्रनाथ सान्याल की पुस्तक ‘बंदी जीवन’ उनकी प्रिय पुस्तक थी, ‘अमेरिका को आजादी कैसे मिली’ जैसी पुस्तकें वे मंगाकर खुद भी पढ़ा करते थे और अन्य साथियों को भी पढ़ने के लिए दिया करते थे। संगठन का ज्यादातर खर्च साहित्य के प्रकाशन व वितरण पर होता था। भागवत गीता पर उनकी अद्भुत पकड़ थी, बहुत कम लोग जानते हैं कि 1925-1928 के बीच का समय उन्होंने एक पुजारी व गीता वाचक के रूप में भूमिगत रहते हुए बिताया। गणेश शंकर विद्यार्थी, पं0 मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल व भगत सिंह से उनका संवाद उनकी तर्कना तथा अर्जित ज्ञान का परिचायक है। पं0 जवाहर लाल नेहरू से उन्होंने फासिस्टवाद, आतंकवाद व क्रांति पर गहन विमर्श किया, जिसका उल्लेख स्वयं पंडित जी ने अपनी पुस्तक में किया है, वे भी आजाद के ज्ञान व प्रखरता से प्रभावित थे। पं0 राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रंातिकारी शायर व भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी विचारक का नेता कोई ज्ञानपुंज ही हो सकता है।

उस समय राजनीति पर कंेद्रित अधिकांश किताबें अंग्रेजी में होती थी। आजाद को अंग्रेजी नहीं आती थी। वे दल के अन्य साथियों, यथा भगत सिंह, शिव वर्मा, बटुकेश्वर दत्त आदि से पुस्तकें पढ़वाकर सुनते थे। शिव वर्मा ने अपने संस्मरण में लिखा है कि आजाद ने कार्ल मार्क्स का ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र‘ दो बार सुना। डाॅ0 लोहिया ने ‘इकोनोमिक्स आफ़्टर मार्क्स ‘ नामक पुस्तक में मार्क्स की अचम्भित कर देने वाली आलोचना की है।

दोनों जीवन पर्यन्त यायावर, अविवाहित व फक्कड़ रहे। दोनों महान नेता मानवीय शोषण, किसी भी प्रकार की मानसिक गुलामी तथा रुढ़िवादी जकड़नों से देश को विशेषकर युवाओं को मुक्त कराने के लिए संकल्पबद्ध थे। आजाद ने कभी अपने नाम के साथ अपनी जाति का उल्लेख नहीं किया, वहीं जातिवाद के खिलाफ लोहिया ने भी अभियान चलाया।

जनमानस में भले ही चंद्रशेखर आजाद की छवि एक सशक्त योद्धा, जीवट के क्रांतिकारी और संगठक की हो या फिर डाॅ0 लोहिया की छवि एक विद्वान, क्रांतिधर्मी चिंतक तथा त्यागमूर्ति की हो लेकिन दोनों कोमल व भावुक व्यक्ति थे। आजाद व लोहिया किसी के भी आंसू देखकर द्रवित हो जाते थे।

आजाद व भगत सिंह की शहादत के बाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी बिखर गई। 1933 में डाॅ0 राममनोहर लोहिया जर्मनी से भारत लौटे। इनके आने के बाद ही 17 मई 1934 को कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ। डाॅ0 लोहिया ने ‘कांग्रेस सोशलिस्ट‘ अखबार निकाला और समाजवाद के चिंतन को जनसामान्य तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया।

चंद्रशेखर आजाद और डाॅ0 लोहिया स्वतंत्रता व समाजवाद के स्वप्नद्रष्टा थे। 15 अगस्त 1947 को देश भले ही सम्प्रभु हो गया लेकिन भारत अभी शहीदों की सोच के अनुरूप नहीं बन सका। स्वतंत्रता एवं समाजवाद का लक्ष्य अभी स्वप्नवत है। सिर्फ संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद‘ जोड़ देने से समाजवाद नहीं आ सकता। निस्संदेह आज की स्थिति में आजाद और लोहिया के विचारों की प्रासंगिकता उनके जीवन काल से भी अधिक प्रतीत होती है। आज आजाद व लोहिया के सपनों, उनकी अवधारणाओं और उनके आदर्शों को पूरा करने की चुनौती नई पीढ़ी के सामने है।

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