‘2027 में फिर से होगा अखिलेश का नाम’: शिवपाल

Update: 2025-02-28 16:06 GMT

लखनऊ। बजट पर चर्चा में शामिल सपा सदस्य शिवपाल सिंह यादव ने कहा कि इस बजट से अफसरशाही ने सरकार को गुमराह करने का काम किया है। सरकार अफसरशाही के जाल में फंस चुकी है। सरकार ने सदन व जनता को गुमराह किया है। 2024-25 का बजट जो सात लाख करोड़ से अधिक का था उसमेंं से विभागों ने अभी 50 से 55 प्रतिशत ही खर्च किया है। बजट में सबका साथ-सबका विश्वास नहीं दिख रहा है।

शिवपाल ने कहा कि सरकार बार-बार बजट के आकार की चर्चा कर रही है। जनता पर तमाम टैक्स लगाया है। गरीब, मजदूरों से भी जीएसटी के माध्यम से टैक्स वसूला जा रहा है। आउटसोर्सिंग में युवकों को आठ-आठ हजार रुपये दिए जा रहे हैं जबकि न्यूनतम 14500 रुपये महीने मिलनी चाहिए।

बजट पर सरकार कह रही है कि सबका ख्याल रखा है, लेकिन इस बजट में सरकार के नारे सबका साथ-सबका विकास नहीं दिख रहा है। किसानों की उपेक्षा की गई है। पिछड़े, दलितों व अल्पसंख्यकों की उपेक्षा की गई है। सिंचाई की कई परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं। सरकार ने किसानों व गरीबों की चिंता नहीं की है।

शिवपाल ने कहा कि गांवों में कम से कम दिन में आठ घंटे और रात में आठ घंटे बिजली दे दें। ट्रांसफार्मर में थोड़ा सुधार हुआ है। विजिलेंस के द्वारा और लाइनमैन भी फोटो खिंच लेता है पहले सेटिंग करते हैं नहीं होता है तो सीधे पर प्राथमिकी दर्ज कर दी जा रही है।

उन्होंने कहा कि पूर्व में राज्य की जीएसडीपी तमिलनाडु के बराबर होती थी और हम दूसरे स्थान पर थे। आज जीएसडीपी में पांचवें स्थान पर आ गए हैं। सरकार झूठ का पर्दा डाल रही है। जब बजट खर्च ही नहीं हो रहा है तो आकार क्यों बढ़ा रहे हैं। यूपी प्रति व्यक्ति आय के मामले में 32वें नंबर पर है। सिर्फ बिहार पीछे है।



सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने शुक्रवार को विधानसभा में बजट पर चर्चा में शामिल होते हुए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के सम्मान में कविता पढ़ी। उन्होंने कहा “अंधेरों की सरकार अब जाने वाली है, जनता की हुंकार अब आने वाली है।

झूठ के महल ज्यादा देर नहीं टिकेंगे, नेता जी के सिपाही फिर से लड़ेंगे। हर खेत को पानी हर हाथ को काम, यही है समाजवादियों की पैगाम। अखिलेश हैं उम्मीद अखिलेश हैं अब शान, 2027 में फिर होगा उनका नाम।”

इससे पूर्व शिवपाल ने वित्त मंत्री सुरेश खन्ना द्वार पढ़ी गई शायरी “तुम सोच रहे हो बस बादल की उड़ानों तक, मेरी तो निगाहें हैं सूरज के ठिकानों तक” को दोहराया। उन्होंने कहा कि खुद को आसमान से उड़ता हुआ बाज समझ रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि जमीन पर जनता बदहाली से कराह रही है।

आपकी निगाहें सूरज के ठिकानों तक होंगी पर क्या यह बताने की जरूरत है कि प्रदेश का किसान कब तक सूखे खेतों को ताकता रहेगा। युवा कब तक बेरोजगारी की तपती धूप में भटकते रहेंगे। अस्पतालों में दवाओं की कमी है। गरीब की थाली से रोटियां गायब हैं और महंगाई से गृहणियां बिलख रही हैं।

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